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भीष्म महागाथा: गंगापुत्र देवव्रत से 'भीष्म' बनने की यात्रा केवल एक नाम का परिवर्तन नहीं, बल्कि सुखों के स्वेच्छापूर्ण निर्वासन की गाथा है। जिस वीर के भुजाओं में परशुराम को रोकने का सामर्थ्य था, उसकी सबसे बड़ी शक्ति उसका अस्त्र नहीं, बल्कि उसका त्याग बना। यह उपन्यास उस द्वंद्व को उजागर करता है जहाँ एक पिता की प्रसन्नता के लिए पुत्र ने अपने भविष्य की आहुति दे दी, किंतु बदले में नियति ने उसे कुरुवंश की जर्जर होती नाव को सँभालने का शाश्वत बोझ थमा दिया।शौर्य, प्रेम और विवशता का त्रिकोणएक ओर भीष्म का वह विराट स्वरूप है जो रणभूमि में काल को भी चुनौती देता है, तो दूसरी ओर वह एकाकी वृद्ध, जो अपनी प्रतिज्ञा की बेड़ियों में जकड़ा हुआ द्रौपदी के चीरहरण और अधर्म के उत्थान का साक्षी बनने को विवश है। इस गाथा में भीष्म के संबंधों की निष्पक्ष पड़ताल है- सत्यवती के प्रति उनकी निष्ठा, अंबा का प्रतिशोध और पांडवों के प्रति उनका अगाध प्रेम, जो अंततः 'इच्छा मृत्यु' के वरदान को एक अभिशाप में बदल देता है।"जब प्रतिज्ञा धर्म से बड़ी हो जाए, तो नायक भी इतिहास का कैदी बन जाता है।"क्या भीष्म वास्तव में अजेय थे? या वे अपनी ही शपथ के हाथों पराजित एक ऐसे महामानव थे, जिसने धर्म की रक्षा के लिए अधर्म का साथ देने की विडंबना को अंत तक निभाया? शरशय्या पर लेटे पितामह की अंतिम सांसों तक चलती यह गाथा आपको कर्तव्य और नैतिकता के उन अनुत्तरित प्रश्नों से साक्षात्कार कराएगी, जो आज भी प्रासंगिक हैं।एक कालजयी व्यक्तित्व की भावुक और प्रेरणादायी महागाथा।About the Author: भागवत (भागवत जायसवाल)पौराणिक इतिहास के रहस्यों और लोक-संस्कृति को जीवंत करने वाले अनूठे रचनाकार छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं इतिहासकार भागवत जायसवाल समकालीन हिंदी साहित्य के उन विरले लेखकों में